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बाल विकास : विकास की संकल्पना एवं तत्व

मानव विकास
मानव विकास की प्रक्रिया जन्म से प्रारंभ होती है तथा मृत्यु तक व्यक्ति में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों द्वारा विकास निरंतर चलता रहता है।
मानव विकास का अर्थ विभिन्न मानव शास्त्रियों ने अलग–अलग रूप में बताया है।
मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसमें पर्यावरण के संपर्क में आकर व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। — वुडवर्थ
मानव स्वभाव एवं व्यवहार का अध्ययन ही मानव विकास है। — क्रो एवं क्रो
मानव विकास का अर्थ है परिपक्वता की ओर बढ़ने वाली व्यवस्थित एवं सतत परिवर्तनों की श्रृंखला। — हर्लॉक
विकास द्वारा व्यक्ति परिपूर्णता की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। — फ्रैंक एवं हग्गार्ट
विकास वह प्रक्रिया है जो व्यवस्थित एवं परस्पर संबंधित परिवर्तनों की श्रृंखला को दर्शाती है। — गैरेट

मानव विकास का महत्व
व्यक्ति को समझने में सहायक।
मानव विकास के तत्वों को जानने में सहायक।
समस्याओं के समाधान में उपयोगी।
भावी जीवन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।
बालक के शिक्षण की योजना बनाने में सहायक।
बालक की वृद्धि एवं विकास के सिद्धांतों को समझने में सहायक।
बालक के भावी जीवन की तैयारी में सहायक।

मानव जीवन का विकास क्रम (एरिक्सन के अनुसार)
(जीवनकाल लगभग 280 वर्ष माना गया है)
1. गर्भावस्था
गर्भावस्था काल : 280 दिन (लगभग)
विकास के चरण
1. शैशवावस्था
पूर्व शैशवावस्था : 15 दिन
शैशवावस्था (शैशव काल) : 45 दिन
उत्तर शैशवावस्था : जन्म से 2 वर्ष
2. बाल्यावस्था
प्रारंभिक बाल्यावस्था : 2 – 6 वर्ष
मध्य बाल्यावस्था : 6 – 12 वर्ष
उत्तर बाल्यावस्था : 12 – 15 वर्ष
3. किशोरावस्था
प्रारंभिक किशोरावस्था : 12 – 18 वर्ष
उत्तर किशोरावस्था : 16 – 18 वर्ष
4. प्रौढ़ावस्था
युवा प्रौढ़ावस्था : 18 – 35 वर्ष
मध्य प्रौढ़ावस्था : 36 – 50 वर्ष
उत्तर प्रौढ़ावस्था : 50 – 60 वर्ष

(1) जन्म-पूर्व अवस्था (गर्भाधान से 9 महीने तक)
गर्भावस्था के दौरान विकास होता है।
9 माह अथवा लगभग 280 दिनों की अवधि होती है।
सूक्ष्म अणुओं से मनुष्य बनने की प्रक्रिया होती है, इसलिए इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
किसी भी अणु में होने वाली कमी जन्म-अपंगता का कारण बन सकती है।
(2) नवजात अवस्था (जन्म से 2 सप्ताह तक)
जन्म के बाद की बहुत ही नाज़ुक अवस्था।
बालक स्वयं पर निर्भर नहीं होता।
बालक का बाहरी दुनिया के साथ सामंजस्य स्थापित होता है।
(3) शैशव अवस्था (15 दिन से 2 वर्ष तक)
बालक स्वावलंबन की ओर अग्रसर होता है।
विकास की तीव्र गति होती है।
माता-पिता, हँसना, बैठना सीखता है।
(4) बाल्यावस्था (3 से 11 वर्ष)
3 से 6 वर्ष को शाला-पूर्व अवस्था कहा जाता है।
6 से 11 वर्ष को शालेय अवस्था में सम्मिलित किया जाता है।
विकास में परिपक्वता आती है।
शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास होता है।
(5) तरुणावस्था (11 से 21 वर्ष)
युवावस्था की ओर संक्रमण काल।
प्रजनन अंगों का विकास पूर्ण होता है।
युवक या युवती बनकर सामने आता है।
बालक मानसिक एवं शारीरिक परिवर्तनों को भली-भाँति अनुभव करता है।
सामाजिक एवं भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त करने का प्रयास करता है।
यह समस्याओं से भरी अवस्था होती है।
(6) प्रौढ़ावस्था (21 से 40 वर्ष)
इस अवस्था में पूर्ण शारीरिक परिपक्वता प्राप्त हो जाती है।
लगभग 20–21 वर्ष में शारीरिक विकास पूर्ण हो जाता है, इसलिए बौद्धिक परिपक्वता भी आती है।
विवाह करना, आजीविका, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री आदि की भूमिका का महत्व रहता है।
व्यक्ति की अपनी विशिष्ट पहचान बनती है।
(7) मध्यावस्था (46 से 60 वर्ष)
जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है।
जीवन में स्थिरता, कर्तव्यों की पूर्ति का समय।
शेष जीवन को संतुलन के साथ जीने का समय माना जाता है।
अंततः शारीरिक ताकत में कमी आती है।
नए बदलावों के साथ समय बिताया जाता है।
(8) वृद्धावस्था (60 वर्ष से मृत्यु तक)
शारीरिक शक्ति कम हो जाती है।
निर्भरता बढ़ जाती है।
हाथ, पैर, कान, आँख आदि कमजोर हो जाते हैं।
मानसिक क्षीणता आ सकती है।
नई पीढ़ी के विचार, बदलाव, वर्तमान प्रश्न होते हैं।
जीवन के साथ सामंजस्य बिठाने की समस्या।
एकांत का समय।
शिक्षा शास्त्र, डॉक्टर, मानवशास्त्री इस अवस्था को सुधारने के प्रयास कर रहे हैं।

दोस्तो अगर आप ऐसा कंटेंट चाहते हो तो कमेंट में बताइए।

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