विकास की संकल्पना एवं अध्ययन के साथ संबंध
शिक्षा मनोविज्ञान में ‘विकास’ और ‘अध्ययन’ दो मूलभूत अवधारणाएँ हैं, जो एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
बालक का सर्वांगीण विकास उसकी अध्ययन प्रक्रिया को प्रभावित करता है, और अध्ययन के माध्यम से बालक के विकास को गति मिलती है।
1. विकास की संकल्पना
विकास का अर्थ जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति में होने वाले गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तनों की प्रक्रिया से है। इसमें केवल शारीरिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं। विकास एक निरंतर, क्रमबद्ध एवं पूर्वानुमेय प्रक्रिया है।
विकास की मुख्य विशेषताएँ
सतत प्रक्रिया : विकास जन्म से मृत्यु तक चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है।
गुणात्मक एवं मात्रात्मक : इसमें गुणात्मक परिवर्तन (जैसे– बुद्धि, विचार शक्ति) तथा मात्रात्मक परिवर्तन (जैसे– ऊँचाई, वजन) दोनों शामिल होते हैं।
व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध : विकास एक निश्चित क्रम में होता है (जैसे– पहले बैठना, फिर खड़ा होना और फिर चलना सीखना)।
व्यक्तिगत भिन्नता : प्रत्येक व्यक्ति का विकास एक-दूसरे से भिन्न होता है।
सर्वांगीण : विकास के सभी पक्ष (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक) एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और परस्पर प्रभाव डालते हैं।
आनुवंशिकता एवं वातावरण का प्रभाव : विकास पर आनुवंशिकता (जन्मजात गुण) और वातावरण (सामाजिक, भौतिक, शैक्षिक वातावरण) दोनों का प्रभाव पड़ता है।
2. अध्ययन
अध्ययन का अर्थ अनुभव एवं अभ्यास के द्वारा व्यवहार में होने वाले स्थायी परिवर्तन से है। यह केवल विद्यालयी शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति नई आदतें, कौशल, ज्ञान एवं व्यवहार सीखता है।
अध्ययन की मुख्य विशेषताएँ
व्यवहार में परिवर्तन : अध्ययन सदैव व्यवहार में परिवर्तन लाता है।
अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन : अध्ययन से होने वाला परिवर्तन अस्थायी नहीं होता, बल्कि अपेक्षाकृत स्थायी होता है।
अनुभव एवं अभ्यास का परिणाम : अध्ययन अनुभव और अभ्यास के कारण होता है (जन्मजात परिवर्तन अध्ययन नहीं कहलाते)।
लक्ष्यपूर्ण एवं उद्देश्यपूर्ण : अध्ययन सदैव किसी लक्ष्य या उद्देश्य से संबंधित होता है।
सर्वव्यापी : अध्ययन औपचारिक (विद्यालय), अनौपचारिक (घर, मित्र) एवं निरौपचारिक (मीडिया, पुस्तकें) रूपों में हो सकता है।
विकास के मुख्य पक्ष
1. शारीरिक विकास (हर्लॉक के अनुसार)
शरीर की ऊँचाई, आकार, वजन, हड्डियों एवं स्नायु तंत्र का विकास।
2. मानसिक / ज्ञानात्मक विकास (जीन पियाजे)
सोचना, समझना, याद रखना, समस्या हल करना, तर्क करना तथा भाषा का विकास (पियाजे के सिद्धांत के अनुसार)।
3. सामाजिक विकास (एरिक एरिक्सन)
अन्य लोगों के साथ संबंध स्थापित करना, सामाजिक नियम सीखना तथा समूह में कार्य करने की क्षमता का विकास।
4. भावनात्मक विकास (डेनियल गोलमैन)
भावनाओं को समझना, व्यक्त करना तथा नियंत्रित करना।
5. नैतिक विकास (कोलबर्ग)
सही–गलत की समझ, नैतिक मूल्यों तथा नैतिकता का विकास।
बालविकास : विकास में व्यक्तिगत विभिन्नता
विकास में व्यक्तिगत विभिन्नता
प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व होता है।
इसी कारण व्यक्ति की योग्यता, क्षमता और बुद्धि में भिन्नता पाई जाती है।
स्किनर के अनुसार
मापन (Measurement) द्वारा ज्ञात किया गया व्यक्तित्व का प्रत्येक पक्ष व्यक्तिगत विभिन्नता को दर्शाता है।
टायलर के अनुसार
शरीर का आकार, रूप, शारीरिक कार्य, गति की क्षमता, बुद्धि, ज्ञान, रुचियाँ तथा व्यक्तित्व के लक्षणों में विभिन्नता देखने को मिलती है।
व्यक्तिगत भिन्नता प्रकृति का सार्वभौमिक नियम है।
व्यक्तिगत विभिन्नता के क्षेत्र
बौद्धिक स्तर
शारीरिक स्तर
व्यक्तित्व का स्तर
अभिरुचि का स्तर
प्रवृत्ति का स्तर
आदतों का स्तर
व्यक्तिगत विभिन्नता के कारण
वंशानुक्रम और आनुवंशिकता
वातावरण
जाति और राष्ट्रीयता
शिक्षा और आर्थिक स्थिति
उम्र और बुद्धि
जातीय विभिन्नता
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