Concept of Development and it Relationship with Learning
1.1 विकास की अवधारणा
विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक निरंतर प्रक्रिया है। विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (Physical), क्रियात्मक (Motor), संज्ञानात्मक (Cognitive), भाषागत (Language), संवेगात्मक (Emotional) एवं सामाजिक (Social) विकास होता है।
बालक में आयु के साथ होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन सामान्यतः क्रमबद्ध (बालक के क्रमबद्ध रूप से होने वाले संगठित परिवर्तन की क्रमिक श्रृंखला को ‘विकास’ कह सकते हैं) होते हैं।
क्रमबद्ध एवं संगठित होना इस बात को संकेत करता है कि बालक के अंदर अब तक हुए गुणात्मक परिवर्तन तथा उसमें आगे होने वाले परिवर्तनों में एक निश्चित सम्बन्ध होता है। आगे होने वाले परिवर्तन अब तक के परिवर्तनों की परिपक्वता पर निर्भर करते हैं।
अरस्तू के अनुसार, “विकास आंतरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति में परिवर्तन है।”
1.2 विकास के अभिलक्षण
विकास एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक होती रहती है। मनोवैज्ञानिकों ने विकास के विभिन्न अभिलक्षणों (Characteristics) को बताया है, जो इस प्रकार हैं—
• विकासात्मक परिवर्तन प्रायः व्यवस्थित, प्रगतिशील और नियमित होते हैं। सामान्य से विशिष्ट और सरल से जटिल तथा एकीकृत से क्रियात्मक स्तरों की ओर अग्रसर होने के दौरान प्रायः यह एक क्रम का अनुसरण करते हैं।
• विकास बहु-आयामी (Multi-dimensional) होता है; अर्थात् कुछ क्षेत्रों में यह बहुत तीव्र वृद्धि को दर्शाता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में धीमी गति से होता है।
• विकास दर में बदलाव होता है। इसका तात्पर्य है कि एक ही व्यक्ति अपनी पिछली विकास दर की तुलना में किसी विशेष क्षेत्र में अपेक्षाकृत अचानक रूप से अच्छा सुधार प्रदर्शित कर सकता है। एक अच्छा परिवेश शारीरिक शक्ति अथवा स्मृति और बुद्धि के स्तर में अनपेक्षित सुधार ला सकता है।
• विकासात्मक परिवर्तनों में प्रायः परिपक्वता में क्रियात्मकता (Functional) के स्तर पर उच्च स्तरीय वृद्धि देखने को आती है, उदाहरणस्वरूप शब्दावली के आकार और जटिलता में वृद्धि; परंतु इस प्रक्रिया में कोई कमी अथवा हानि भी निहित हो सकती है, जैसे—हड्डियों के घनत्व में कमी या वृद्धावस्था में याददाश्त (स्मृति) का कमजोर होना।
• विकासात्मक परिवर्तन ‘मात्रात्मक’ (Quantitative) हो सकते हैं; जैसे—आयु बढ़ने के साथ कद बढ़ना, अथवा ‘गुणात्मक’ जैसे नैतिक मूल्यों का निर्माण।
• किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ-साथ संवेगात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक क्रियात्मकता में भी तेजी से परिवर्तन दिखाई देते हैं।
• विकास प्रभावित हो सकता है। यह ऐतिहासिक, पर्यावरणीय और सामाजिक-सांस्कृतिक घटकों से प्रभावित हो सकता है।
• विकासात्मक परिवर्तनों की दर अथवा गति में उल्लेखनीय ‘व्यक्तिगत अंतर’ हो सकते हैं। यह अंतर आनुवंशिक घटकों अथवा पर्यावरणीय प्रभावों के कारण हो सकते हैं। कुछ बच्चे अपनी आयु की तुलना में अत्यधिक पूर्व-चेतन (जागरूक) हो सकते हैं, जबकि कुछ बच्चों में विकास की गति बहुत धीमी होती है। उदाहरणस्वरूप, यद्यपि एक औसत बच्चा 3 शब्दों के वाक्य 3 वर्ष की आयु में बोलना शुरू कर देता है, परंतु कुछ ऐसे बच्चे भी हो सकते हैं, जो 2 वर्ष के होने से बहुत पहले ही ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं।
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