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विकास की अवधारणा एवं इसका अधिगम से सम्बन्ध

 Concept of Development and it               Relationship with Learning 1.1 विकास की अवधारणा विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक निरंतर प्रक्रिया है। विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (Physical), क्रियात्मक (Motor), संज्ञानात्मक (Cognitive), भाषागत (Language), संवेगात्मक (Emotional) एवं सामाजिक (Social) विकास होता है। बालक में आयु के साथ होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन सामान्यतः क्रमबद्ध (बालक के क्रमबद्ध रूप से होने वाले संगठित परिवर्तन की क्रमिक श्रृंखला को ‘विकास’ कह सकते हैं) होते हैं। क्रमबद्ध एवं संगठित होना इस बात को संकेत करता है कि बालक के अंदर अब तक हुए गुणात्मक परिवर्तन तथा उसमें आगे होने वाले परिवर्तनों में एक निश्चित सम्बन्ध होता है। आगे होने वाले परिवर्तन अब तक के परिवर्तनों की परिपक्वता पर निर्भर करते हैं। अरस्तू के अनुसार, “विकास आंतरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति में परिवर्तन है।” 1.2 विकास के अभिलक्षण विकास एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक होती रहती है। मनोवैज्ञानिकों ने विकास ...
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🔘 वंशानुक्रम और वातावरण 🔘

📝 वंशानुक्रम और वातावर           क्रो और क्रो के अनुसार : व्यक्ति का निर्माण केवल वंशानुक्रम से ही नहीं होता है और न ही केवल वातावरण से, बल्कि वंशानुक्रम और सामाजिक वातावरण—इन दोनों की पारस्परिक अंतःक्रिया व्यक्ति के विकास की नींव बनती है।                         📖 वंशानुक्रम क्या है? वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो माता-पिता से प्राप्त होने वाले शारीरिक और मानसिक गुणों को वंशानुक्रम कहते हैं। संतान को गर्भधारण के समय माता-पिता से जो गुण प्राप्त होते हैं, वही उसके शारीरिक और मानसिक लक्षणों के निर्धारक होते हैं। 1. गुणसूत्र (Chromosomes) जनन कोशिकाओं में गुणसूत्र पाए जाते हैं। गुणसूत्रों की संख्या समान नहीं होती। मानव शरीर की सामान्य कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं। जनन कोशिकाओं में 23 गुणसूत्र होते हैं। प्रत्येक माता-पिता से संतान को 23–23 गुणसूत्र प्राप्त होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में अनेक जीन (Genes) होते हैं। जीन ही वंशानुगत लक्षणों को नियंत्रित करते हैं। 2. आनुवंशिक लक्षणों का विभाजन मात...

મુખ્ય વ્યક્તિઓનાં ઉપનામ

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🌐 वृद्धि एवं विकास के लक्षण और सिद्धांत

📖 वृद्धि एवं विकास के लक्षण और सिद्धांत 📖 व्यक्तिगत कारक : वृद्धि एक मात्रात्मक कारक है, जबकि विकास एक गुणात्मक कारक है। क्रो और क्रो : वृद्धि का अर्थ है शरीर के किसी अंग या अवयव में होने वाला परिवर्तन, और विकास का अर्थ है व्यक्ति के संपूर्ण मनोशारीरिक तंत्र में होने वाला सर्वांगीण एवं प्रगतिशील परिवर्तन। वृद्धि और विकास के लक्षण : विकास की प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, इसलिए वह तुरंत अनुभव में नहीं आती। जैसे – बच्चे का दाँत टूटना, आश्चर्यजनक घटना है। माता के गर्भ में जब भ्रूण पाँच माह का होता है, तभी दाँतों का विकास प्रारंभ हो जाता है। एक ही समय में प्रत्येक अंग का आकार समान नहीं होता, लेकिन समय के साथ वह उचित आकार ग्रहण कर लेता है। विकास सामान्यीकरण से विशिष्टीकरण की ओर जाने वाली प्रक्रिया है। बालक प्रारंभ में बड़े स्नायु-व्यवहार का उपयोग करता है, बाद में छोटे स्नायु-व्यवहार का उपयोग करता है। व्यक्ति को भाई, बहन, माता, पिता के रूप में पहचान प्राप्त होती है। विकास और वृद्धि मस्तक से पाद (सिर से पैर) की ओर गति करते हैं। शरीर के ऊपरी भागों की वृद्धि निचले भागों की वृद्धि की तुलना में ...

विकास की संकल्पना एवं अध्ययन के साथ संबंध

विकास की संकल्पना एवं अध्ययन के साथ संबंध शिक्षा मनोविज्ञान में ‘विकास’ और ‘अध्ययन’ दो मूलभूत अवधारणाएँ हैं, जो एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। बालक का सर्वांगीण विकास उसकी अध्ययन प्रक्रिया को प्रभावित करता है, और अध्ययन के माध्यम से बालक के विकास को गति मिलती है। 1. विकास की संकल्पना विकास का अर्थ जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति में होने वाले गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तनों की प्रक्रिया से है। इसमें केवल शारीरिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं। विकास एक निरंतर, क्रमबद्ध एवं पूर्वानुमेय प्रक्रिया है। विकास की मुख्य विशेषताएँ सतत प्रक्रिया : विकास जन्म से मृत्यु तक चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है। गुणात्मक एवं मात्रात्मक : इसमें गुणात्मक परिवर्तन (जैसे– बुद्धि, विचार शक्ति) तथा मात्रात्मक परिवर्तन (जैसे– ऊँचाई, वजन) दोनों शामिल होते हैं। व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध : विकास एक निश्चित क्रम में होता है (जैसे– पहले बैठना, फिर खड़ा होना और फिर चलना सीखना)। व्यक्तिगत भिन्नता : प्रत्येक व्यक्ति का विकास एक-दूसरे से भिन्न होता है। सर्वांगीण...

बाल विकास : विकास की संकल्पना एवं तत्व

मानव विकास मानव विकास की प्रक्रिया जन्म से प्रारंभ होती है तथा मृत्यु तक व्यक्ति में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों द्वारा विकास निरंतर चलता रहता है। मानव विकास का अर्थ विभिन्न मानव शास्त्रियों ने अलग–अलग रूप में बताया है। मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसमें पर्यावरण के संपर्क में आकर व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। — वुडवर्थ मानव स्वभाव एवं व्यवहार का अध्ययन ही मानव विकास है। — क्रो एवं क्रो मानव विकास का अर्थ है परिपक्वता की ओर बढ़ने वाली व्यवस्थित एवं सतत परिवर्तनों की श्रृंखला। — हर्लॉक विकास द्वारा व्यक्ति परिपूर्णता की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। — फ्रैंक एवं हग्गार्ट विकास वह प्रक्रिया है जो व्यवस्थित एवं परस्पर संबंधित परिवर्तनों की श्रृंखला को दर्शाती है। — गैरेट मानव विकास का महत्व व्यक्ति को समझने में सहायक। मानव विकास के तत्वों को जानने में सहायक। समस्याओं के समाधान में उपयोगी। भावी जीवन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। बालक के शिक्षण की योजना बनाने में सहायक। बालक की वृद्धि एवं विकास के सिद्धांतों को समझने में सहायक। बाल...